दो फूल थे साथ में पड़े बिखरे से मुरझाये से ,टूट गए थे टहनियों से अपनी पर ज़िंदा थे ,मायूस से थे, न जाने क्यों खुद पे शर्मिंदा थे ,किसी ने पूछा उनसे के तुम क्यों उदास हो ?क्या हुआ जो टूट गए टहनियों से अपनी फिर भी तुम इक दूजे के पास हो ....क्या यह काम है के तुम साथ हो ,बह जाओगे या , बन जाओगे शान किसी मंदिर की , यह मत सोचो ...बस याद करो उस पल को , जब हम साथ थे और अब भी साथ हो ..यह सोच के वह थे मुस्कुराये से ...दो फूल थे साथ में बिखरे से मुरझाये से...
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